बलरामपुर में खून के काले कारोबार का खुलासा:सरकारी ब्लड बैंक से निजी सेंटर तक पहुंचाने का आरोप, तीन जिलों में फैला नेटवर्क
बलरामपुर में अवैध रक्त कारोबार का खुलासा हुआ है, जिसने देवीपाटन मंडल के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो संविदाकर्मियों की गिरफ्तारी के बाद यह सामने आया है कि सरकारी ब्लड बैंक और निजी ब्लड सेंटर के बीच कथित मिलीभगत से लंबे समय से खून का अवैध कारोबार चल रहा था। इस नेटवर्क का विस्तार बलरामपुर, गोंडा और श्रावस्ती जिलों तक फैला हुआ बताया जा रहा है। जांच में पता चला है कि केके चैरिटेबल ब्लड सेंटर का संचालक अभिषेक सिंह संयुक्त जिला चिकित्सालय के ब्लड बैंक में संविदा पर कार्यरत था। इसके अलावा, ब्लड बैंक के लैब टेक्नीशियन की पत्नी भी इसी ट्रस्ट की सदस्य हैं। सरकारी ब्लड बैंक की पैथोलॉजिस्ट की डिग्री का निजी ब्लड सेंटर में कथित तौर पर इस्तेमाल किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। आशंका है कि सरकारी रक्तदान शिविरों में एकत्रित रक्त निजी ब्लड सेंटर तक पहुंचाया जाता था। साथ ही, निजी सेंटर में एक्सपायर हो चुके रक्त और प्लेटलेट्स को सरकारी अस्पताल के मरीजों को चढ़ाने की भी जांच की जा रही है। आरोपित अभिषेक सिंह के पिता जगदीश सिंह पूर्व में सीएमओ कार्यालय में तैनात थे। उन्होंने संयुक्त जिला चिकित्सालय के लैब टेक्नीशियन के साथ मिलकर केके चैरिटेबल ट्रस्ट का गठन किया था। इस ट्रस्ट में दोनों परिवारों के सदस्यों को शामिल किया गया और सीएमओ कार्यालय से कुछ ही दूरी पर ब्लड सेंटर का संचालन शुरू हो गया। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि सह-संचालक सौरभ श्रीवास्तव श्रावस्ती के संयुक्त जिला चिकित्सालय में तैनात हैं। वह तुलसीपुर में भी एक ब्लड सेंटर चला रहे थे। बाद में गोंडा में न्यू केके ब्लड सेंटर भी खोला गया, जिससे तीन जिलों में एक संगठित नेटवर्क तैयार हो गया। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब गोंडा के मनकापुर निवासी मदन गोपाल की बेटी की कथित तौर पर इसी ब्लड सेंटर से उपलब्ध कराए गए रक्त को चढ़ाने के बाद मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और स्वास्थ्य विभाग के साथ औषधि प्रशासन भी सक्रिय हो गया। अब इस मामले की कई स्तरों पर जांच की जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार, आरोपित मजदूर और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को रक्तदान के लिए तैयार करते थे। उन्हें मामूली रकम देकर रक्त लिया जाता और बाद में वही रक्त निजी अस्पतालों में 8 से 10 हजार रुपये तक में बेचा जाता था। स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय की पैथोलॉजिस्ट डॉ. आकांक्षा शुक्ला का कहना है कि उन्होंने मई 2025 में अपनी डिग्री ब्लड सेंटर में लगाई थी, जिसे अक्टूबर 2025 में हटा लिया था। हालांकि सोमवार को जब स्वास्थ्य विभाग और औषधि प्रशासन की टीम ब्लड सेंटर को सील करने पहुंची तो वहां लगे बोर्ड पर सबसे ऊपर उनका नाम दर्ज मिला। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मुकेश कुमार रस्तोगी ने अपर सीएमओ डॉ. संतोष कुमार श्रीवास्तव की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति में अपर सीएमओ डॉ. ए.के. चौधरी, संयुक्त जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. राजकुमार और वरिष्ठ सहायक राजेश कुमार हंस शामिल हैं। समिति को तीन दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही एनएचएम संविदाकर्मी अभिषेक सिंह की सेवा समाप्त करने के लिए भी जांच आख्या तलब की गई है। अधिकारियों का कहना है कि यह भी जांच का विषय है कि सरकारी ब्लड बैंक की पैथोलॉजिस्ट की डिग्री किन परिस्थितियों में निजी ब्लड सेंटर में इस्तेमाल हो रही थी। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है। आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी, जबकि गिरफ्तार आरोपितों के विरुद्ध पुलिस की कार्रवाई आगे बढ़ रही है।
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