इलाज से पहले का दर्द...:9 बजे से लाइन में, 12 बजे डॉक्टर ने देखा, 4 बजे एक्स-रे और पौने 5 पर आई रिपोर्ट; तब तक विशेषज्ञ चले गए

Apr 30, 2026 - 10:34
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इलाज से पहले का दर्द...:9 बजे से लाइन में, 12 बजे डॉक्टर ने देखा, 4 बजे एक्स-रे और पौने 5 पर आई रिपोर्ट; तब तक विशेषज्ञ चले गए
सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना किसी जंग से कम नहीं है। इन सरकारी अस्पतालों में आम आदमी रोज इलाज के नाम पर जंग लड़ता है। पहले रजिस्ट्रेशन की लाइन, फिर डॉक्टर की जांच के लिए कतार, इसके बाद आवश्यक जांच और अंत में रिपोर्ट के लिए कतार। जब तक रिपोर्ट हाथ में आती है, तब तक डॉक्टर के केबिन बंद हो जाते हैं। और दूसरे दिन फिर से शुरू होती है कतार...। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से आने वाले मरीजों के लिए रायपुर के एम्स, मेकाहारा और डीकेएस किसी मंदिर से कम नहीं हैं, लेकिन इन मंदिरों के भीतर की हकीकत पत्थर के बुतों जैसी ही ठंडी और बेदर्द है। दैनिक भास्कर की टीम जब खुद मरीज बनकर इन अस्पतालों में पहुंची तो पता चला कि बीमारी ठीक करने के पहले सिस्टम जो इंतजार करवाता है, वह इंसान को और बीमार कर देती है। यहां डॉक्टर के स्टेथोस्कोप से पहले सरकारी फाइलों और कतारों का शोर सुनाई देती है। आज प​ढ़िए एम्स में कैसे एक व्यक्ति को अलग-अलग कतारों में खड़े होकर इलाज और जांच के लिए इंतजार करना पड़ता है... एम्स.... सुबह साढ़े 9 बजे से लगी लाइन, 4.45 तक जूझते रहे, कोई सुनने वाला नहीं रायपुर एम्स, जिसे प्रदेश का सबसे आधुनिक अस्पताल कहा जाता है। यहां की असली परेशानी इमारतों के बीच की दूरी और लंबी प्रक्रिया में साफ नजर आती है। सुबह साढ़े 9 बजे जब हम ऑर्थो के मरीज बनकर अस्पताल पहुंचे, तब वहां पहले से ही लंबी लाइन लगी हुई थी। हमने ड्रीफकेस एप खोलकर टोकन लिया। टोकन नंबर 2302 था, जबकि कार्ड बनाने वाली लाइन में 750 नंबर चल रहा था। इस टोकन के जरिए पहले कार्ड बनाना होता है, फिर उसी कार्ड के आधार पर डॉक्टर को दिखाया जाता है। करीब एक घंटे कतार में खड़े रहने के बाद एक गार्ड ने घोषणा की कि ऑर्थो के मरीज डी-ब्लॉक में जाकर रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं। यह सुनकर हम डी-ब्लॉक पहुंचे, जहां भी लाइन लगी थी, लेकिन पहले से कम। करीब आधे घंटे बाद 11 बजे हमारा कार्ड बना। इसके बाद हम ऑर्थो वार्ड पहुंचे, जहां हमें फिर से 154 नंबर दिया गया। यहां बैठने की व्यवस्था सीमित थी, कई मरीज दीवार के सहारे खड़े थे तो कुछ दर्द में जमीन पर बैठकर इंतजार कर रहे थे। गार्ड 10-10 मरीजों को बुला रहा था और हमारी बारी 12 बजे आई। डॉक्टर ने जांच कर दवाइयां लिखीं और एक्स-रे कराने कहा। इसके बाद एक्स-रे की पर्ची बनवाने डॉक्टर के कमरे के पास पहुंचे, जहां 5-7 लोग पहले से लाइन में थे। 15 मिनट बाद हमारी पर्ची बनी। इसके बाद बिलिंग काउंटर की लाइन में लगे, लेकिन 10 मिनट बाद ही महिला स्टाफ ने सभी से कार्ड जमा करा लिए और 12.30 बजे लंच ब्रेक का बोर्ड लगाकर काउंटर बंद कर दिया। आधे घंटे बाद स्टाफ लौटी और नाम पुकारे गए। इसी दौरान एक महिला केवल डिजिटल भुगतान की शर्त के कारण रोने लगी। उसने कैश देने की बात कही, लेकिन स्टाफ ने मना कर दिया और उसे दूसरे काउंटर जाने को कहा। बाद में एक व्यक्ति ने उसकी मदद कर डिजिटल भुगतान किया। हमारी बारी आने पर एक्स-रे के लिए बी-ब्लॉक भेजा गया। ऑर्थो डी-ब्लॉक में और एक्स-रे बी-ब्लॉक में होने से मरीजों को एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक जाना पड़ा। कई मरीज दर्द में पसीने से तर-बतर होकर पहुंचे। बी-ब्लॉक में फिर लाइन लगी, जहां हमारा नंबर 131 था। गार्ड ने 2 बजे के बाद आने को कहा। 2.20 बजे पहुंचे तो 82 नंबर चल रहा था। आखिरकार 4 बजे एक्स-रे हुआ और 4:45 बजे रिपोर्ट मिली। रिपोर्ट लेकर ऑर्थो विभाग पहुंचे तो 5 बज चुके थे और डॉक्टर जा चुके थे। गार्ड ने शनिवार को आने को कहा, क्योंकि डॉक्टर बुधवार के बाद शनिवार को ही देखते हैं। इस तरह पहले दिन इलाज नहीं हो सका और पूरा दिन कतार में बीत गया। शनिवार को फिर पहुंचे, तब डॉक्टर ने एक्स-रे देखकर दवाइयां लिखीं। मरीजों की संख्या अधिक एम्स रायपुर में मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण कभी-कभी ओपीडी परामर्श, जांच और रिपोर्टिंग में समय लग सकता है। गंभीर एवं आपातकालीन मरीजों को प्राथमिकता दी जाती है। प्रतीक्षा समय कम करने और सेवाओं को अधिक सुचारु बनाने के लिए संस्थान लगातार प्रयासरत है। मरीजों को गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध उपचार उपलब्ध कराना एम्स रायपुर की प्राथमिकता है। -डॉ. मृत्युंजय राठौड़, पीआरओ, एम्स

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