मेडिकल पीजी प्रवेश:नियम बदले तो एडमिशन खत्म! हाईकोर्ट ने काउंसलिंग रद्द किए जाने को ठहराया सही

Jan 29, 2026 - 09:04
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मेडिकल पीजी प्रवेश:नियम बदले तो एडमिशन खत्म! हाईकोर्ट ने काउंसलिंग रद्द किए जाने को ठहराया सही
हाई कोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर एक अहम फैसला दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि छत्तीसगढ़ मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट प्रवेश नियम, 2025 के नियम 11 में किए गए संशोधन के बाद किसी भी अभ्यर्थी के पास पहले से आवंटित सीट पर बने रहने का कोई अकाट्य अधिकार नहीं रह जाता है। नियमों में बदलाव और काउंसलिंग रद्द होने से पुराना एडमिशन मान्य नहीं रह गया है। भिलाई निवासी अनुष्का यादव ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। तर्क दिया कि उसने मेरिट के आधार पर भिलाई के एक निजी मेडिकल कॉलेज में रेडियो डायग्नोसिस की सीट हासिल की थी। 10.79 लाख रुपए फीस सहित 10 लाख की बैंक गारंटी जमा कर जॉइन कर लिया था। वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि काउंसलिंग रद्द करने का निर्णय कोई मनमानी कार्रवाई नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा डॉ. तन्वी बहल मामले में दिए गए आदेश के पालन में उठाया गया कदम था। इसके अलावा कहा कि डोमिसाइल आधारित आरक्षण पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में असंवैधानिक है, और केवल संस्थागत प्राथमिकता को ही एक सीमा तक अनुमति दी जा सकती है। 50 प्रतिशत सीटें पूरी तरह से ओपन मेरिट के आधार पर भरी जा सकें। प्रोविजनल अलॉटमेंट को अंतिम नहीं माना जा सकता हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद सरकार के फैसले को सही ठहराया। कहा कि जब प्रवेश प्रक्रिया न्यायिक जांच और नियमों के अधीन हो तो प्रोविजनल अलॉटमेंट को अंतिम नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इस मुद्दे पर अब और कोई नई याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, ताकि प्रवेश प्रक्रिया में अनुशासन और अंतिम रूप सुनिश्चित किया जा सके। इस निर्णय के बाद अब राज्य में पीजी मेडिकल सीटों के लिए नए नियमों के तहत नए सिरे से काउंसलिंग का रास्ता साफ हो गया है। कोर्ट कर्मचारी रेगुलर स्टूडेंट के तौर पर नहीं कर सकेंगे पढ़ाई बिलासपुर| हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालतों में कार्यरत कोई भी कर्मचारी सेवा में रहते हुए एक नियमित छात्र के रूप में शैक्षणिक डिग्री हासिल नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया है। सिंगल बेंच ने एक कर्मचारी को नियमित छात्र के तौर पर एलएलबी फाइनल ईयर की पढ़ाई के तौर पर करने की अनुमति दी गई थी । रायपुर जिला कोर्ट में असिस्टेंट ग्रेड-3 के पद पर कार्यरत अजीत चौबेलाल गोहर ने अपनी परिवीक्षा अवधि के दौरान एलएलबी की पढ़ाई शुरू की थी। उसे प्रथम और द्वितीय वर्ष की अनुमति दी गई थी, लेकिन सत्र 2025-26) में तीसरे वर्ष की अनुमति देने से विभाग ने इनकार कर दिया। विभाग का कहना था कि नए नियमों के तहत नियमित छात्र के तौर पर पढ़ाई की अनुमति नहीं दी जा सकती। उसने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। सिंगल बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि चूंकि उसने दो साल की पढ़ाई पूरी कर ली है, इसलिए तीसरे वर्ष की अनुमति मिलनी चाहिए। हाई कोर्ट प्रशासन ने रजिस्ट्रार जनरल के जरिए इस फैसले के खिलाफ अपील की थी। प्राइवेट-पत्राचार से पढ़ाई की मंजूरी हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने नए नियमों का हवाला देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ जिला न्यायपालिका स्थापना नियम 2023 के नियम 11 के तहत कोई भी कर्मचारी नियमित उम्मीदवार के रूप में परीक्षा में शामिल नहीं हो सकता। केवल निजी या पत्राचार के माध्यम से ही पढ़ाई की जा सकती है। हाई कोर्ट ने सिंगल बेंच के 10 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही विभाग द्वारा 4 सितंबर 2025 को कर्मचारी को अनुमति देने से इनकार करने के आदेश को बरकरार रखा है। विभाग का पक्ष नहीं सुना हाई कोर्ट ने पाया कि सिंगल बेंच पीठ ने विभाग को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना ही पहली सुनवाई में आदेश जारी कर दिया था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है। कहा कि नियमित छात्र के तौर पर पढ़ाई करने से कार्यालय के कामकाज और प्रशासनिक अनुशासन पर सीधा असर पड़ता है।

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