धरहरकला, पुष्पराजगढ़ (अनूपपुर) के स्वयंभू श्री सिद्ध बटुकगणेश जी
( मनोज कुमार द्विवेदी ,अनूपपु्र, मप्र ) अनूपपुर - अमरकंटक मार्ग मे राजेन्द्रग्राम से लगभग 10 किमी दक्षिण की ओर धरहरकला गांव मे श्री सिद्ध गणेशजी के बालस्वरूप प्रतिमा के दर्शन होते हैं। मैं यहाँ 1981 से लगभग नियमित जाता रहा हूं और मैने यह पाया कि यह दुनिया भर मर पाई जाने वाली सामान्य चतुर्भुज गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देते हैं। बालस्वरुप होने के कारण यह प्रतिमा द्विभुज है और बाएं हाथ में कटोरा/पात्र लिये हुए हैं । इसलिए इन्हे बटुक गणेश भी कहा जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह प्रतिमा कल्चुरी कालीन, धार्मिक ,आध्यात्मिक, ऐतिहासिक महत्व की प्रतिमा है। जिसके मन्दिर परिसर मे इतिहास के बहुत से अवशेष बिखरे पडे हैं। स्थानीय परंपरा और जन श्रुतियों के अनुसार इस बाल स्वरूप को गणेशजी के विद्यार्थी/बटुक स्वरूप से जोड़ा जाता है। दशकों पहले इसमे जनेऊ नही दिखता था किंतु अब प्रतिमा पर जनेऊ भी स्पष्ट दिखाई देता है। जिले के वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्रग्राम निवासी श्री आशुतोष सिंह दीक्षित इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ते हुए बताया है कि उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा में पात्र/भिक्षापात्र का विशेष संदर्भ रहा है । यह पात्र विद्या, विनय, संयम और ब्रह्मचर्य के संकेत से जुड़ सकता है। गणपति की यह प्रतिमा कल्चुरीकालीन मानी जाती है और स्थानीय मान्यता है कि इसका आकार समय के साथ बढ़ रहा है। हालांकि प्रतिमा के प्रतिवर्ष बढ़ने की बात की पुरातात्विक/वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं होने के बावजूद स्थानीय लोगों मे इसकी चर्चा सुनी जा सकती है । इसके आसपास कल्चुरीकालीन शिव, ब्रह्मा, विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएँ तथा गौरी कुंड भी हैं। धरहरकला के प्राचीन शिवमंदिर और स्वयंभू गणेश मंदिर को राज्य पुरातत्व की दृष्टि से भी संरक्षित स्मारक क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। धरहर गणेश की इस प्रतिमा की मुद्रा, सूंड, हाथ में पात्र, जनेऊ, वाहन और इसे भव्य ,दिव्य स्वरुप प्रदान करते हैं । मां नर्मदा की उद्गम अमरकंटक से उत्तर दिशा मे स्थित होने के कारण मान्यता यह भी है कि अमरकंटक मे माई के और जलेश्वरधाम मे भगवान शिव के दर्शन से पूर्व धरहरधाम के श्री गणेश के दर्शन जरुर करना चाहिये। जनश्रुति यह भी है कि इस सुदर्शन गणपति प्रतिमा की विशेषताओं को देखते हुए कुछ लोगों ने प्रतिमा को यहां से अन्यत्र विस्थापित करने की पूरी कोशिश की लेकिन इसके सारे प्रयास विफल हो गये। मन्दिर के समीप एक शिवालय का भग्नावशेष भी है जिसे कुछ लोग सूर्य मन्दिर भी कहते है। इसके पश्चिम मे कुछ ही दूर पर प्राकृतिक झरना भी है। यहां आकर प्रकति के हर रंग और हर संगीत की अनुभूति की जा सकती है। समय के अनुरुप श्रद्धालुओं की संख्या मे वृद्धि हुई है । जिसके चलते यहां मन्दिर को नया स्वरुप दिया गया है और आसपास कुछ पक्के निर्माण किये गये हैं। वर्ष मे यहां मेला भी लगता है। आवश्यकता इस बात की जरुर है कि मुख्य मार्ग से लगभग 500 मीटर दूर इस प्राकृतिक सुरम्य स्थान मे पक्के निर्माण ,अतिक्रमण सख्ती से रोके जाएं। यह देखना स्थानीय पंचायत का कार्य है कि यहां अब कोई अतिक्रमण ,कोई पक्का निर्माण ना कराया जाए। मनोकामना सिद्धि के लिये विख्यात इस बटुक गणपति मन्दिर मे आने वाले सभी श्रद्धालुओं से यही अपील है कि यहां आकर पुण्य जरुर कमाएं लेकिन यहां की पवित्रता और शुद्धता को बनाए रख कर। #जय_गणपति #धरहरकला_पुष्पराजगढ_मप्र
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0