डेढ़ लाख की सैलरी वाला कोर्ट में बोला– मैं चपरासी:तलाक लेने का बहाना– मैं मेडिकल अनफिट, कोर्ट ने कहा–16 हजार महीना देने होंगे
कानून की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाने की कोशिश एक पति को महंगी पड़ गई है। पत्नी को भरण-पोषण भत्ता न देना पड़े इसके लिए उसने कोर्ट में खुद को बैंक का चपरासी बता दिया, जबकि वो बैंक में असिस्टेंट मैनेजर था। उसने अपनी गरीबी और लाचारी का ऐसा ताना-बाना बुना कि एक बार के लिए उसकी बातों पर कोई भी यकीन कर ले। उसके इस झूठ को सूचना के अधिकार यानी आरटीआई से मिली जानकारी ने सबके सामने ला दिया। उसकी डेढ़ लाख रुपए महीने तनख्वाह थी। वह आलीशान मकानों का मालिक था। इस जानकारी के आधार पर इंदौर के फैमिली कोर्ट ने इस मामले में एक ऐसा ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया। कोर्ट ने पति को नहीं, बल्कि सीधे बैंक को आदेश दिया है कि वह अपने मैनेजर की सैलरी से हर महीने 16,000 रुपए काटकर उसकी पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… कोर्ट में बोला- मैं तो चपरासी हूं साहब… यह कहानी इंदौर की रहने वाली 31 वर्षीय कामिनी और उसके 32 वर्षीय पति सूरज (दोनों के नाम बदले हुए हैं) की है। सूरज वर्तमान में खरगोन जिले के कसरावद स्थित बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में के पद पर कार्यरत है। लगभग आठ साल पहले दोनों की शादी हुई, लेकिन समय के साथ उनके रिश्ते में ऐसी कड़वाहट घुली कि मामला अदालत तक जा पहुंचा। जब पत्नी कामिनी ने अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग करते हुए भरण-पोषण के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो मैनेजर पति ने अपनी असलियत छिपाने के लिए एक सोची-समझी पटकथा तैयार की। उसने कोर्ट के समक्ष हलफनामा देकर कहा, ‘हुजूर, मैं बैंक में सिर्फ एक चपरासी हूं। मेरी मासिक आय बमुश्किल 15 से 20 हजार रुपए है।’ उसने अपनी 'दयनीय' आर्थिक स्थिति का रोना रोते हुए दलील दी कि इस मामूली तनख्वाह में वह खुद का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से कर पाता है। उसने अपने बूढ़े माता-पिता की जिम्मेदारी, उनकी दवाइयों का खर्च, किराए का कमरा, और अपने खुद के मेडिकल बिलों का हवाला देकर खुद को एक बेबस और लाचार पति के रूप में पेश किया। RTI ने खोली मैनेजर की पोल कामिनी और उनके वकील, एडवोकेट के.पी. माहेश्वरी, को सूरज की इस दर्द भरी कहानी पर यकीन नहीं हुआ। उन्हें शक था कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। सच को सामने लाने के लिए उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) का इस्तेमाल करने का फैसला किया। उन्होंने सूरज के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) और बैंक से उसकी सैलरी से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी। कुछ ही हफ्तों में जो दस्तावेज सामने आए, उन्होंने सूरज के झूठ को बेनकाब कर दिया। उसके चारों झूठ सामने आ गए। रसूख का इस्तेमाल कर कोर्ट के वारंट लौटा देता था
एडवोकेट माहेश्वरी ने बताया कि मामले की शुरुआत में, कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए 8,000 रुपए प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण का आदेश दिया था, लेकिन सूरज ने पिछले चार सालों में अपनी पत्नी को एक फूटी कौड़ी तक नहीं दी। जब भरण-पोषण की बकाया राशि लाखों में पहुंच गई, तो कोर्ट ने कानून का पालन न करने पर वसूली वारंट जारी किए। यहां भी मैनेजर पति ने अपने पद और रसूख का जमकर दुरुपयोग किया। जैसे ही कोर्ट का वारंट कसरावद स्थित उसकी बैंक शाखा में पहुंचता, वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उसे बिना तामील कराए ही वापस भिजवा देता। यह सिलसिला एक बार नहीं, बल्कि कई बार चला। कोर्ट का फैसला- बैंक ही सीधे काटेगा सैलरी
जब वारंट जैसे कानूनी हथियार भी मैनेजर के रसूख के आगे बेअसर साबित हो गए, तो पत्नी ने थक-हारकर कोर्ट से एक आखिरी गुहार लगाई। उसने प्रार्थना की कि भरण-पोषण की राशि सीधे पति के वेतन से ही काटी जाए, ताकि उसे हर महीने बैंक और कोर्ट के चक्कर न काटने पड़ें। इस पर कुटुंब न्यायालय ने एक अभूतपूर्व और सख्त कदम उठाया, जो इस केस को ऐतिहासिक बनाता है। कोर्ट ने पिछले बकाया और नियमित मेंटेनेंस को जोड़कर 16,000 रुपए प्रति माह की कटौती का आदेश सीधे बैंक ऑफ इंडिया की कसरावद शाखा को भेजा है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि अब यह बैंक की जिम्मेदारी होगी कि वह हर महीने मैनेजर सूरज की सैलरी से यह राशि काटकर सीधे उसकी पत्नी कामिनी के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर करे। पत्नी के कैरेक्टर पर कीचड़ उछालकर मांगा था तलाक
इस मामले का एक और पहलू पति की बदनीयती को उजागर करता है। पत्नी से पूरी तरह से पीछा छुड़ाने के लिए सूरज ने तलाक का एक केस भी दायर किया था। इसमें उसने पत्नी के चरित्र पर बेहद गंभीर और ओछे आरोप लगाए थे। पति ने दावा किया था कि उसकी पत्नी का चरित्र ठीक नहीं है और वह इंदौर के एक होटल में अपने प्रेमी के साथ जन्मदिन मनाती है। उसने सबूत के तौर पर कुछ तस्वीरें और वीडियो भी पेश किए, जो विडंबना यह थी कि पत्नी की ही एक सहेली ने बनाए थे, लेकिन जब कोर्ट में इस मामले की गहराई से जांच हुई, तो यह आरोप भी ताश के पत्तों की तरह ढह गए। जांच में यह साफ हो गया कि पत्नी ने अपना जन्मदिन अपने परिवार वालों के साथ मनाया था और उसे इंदौर भेजने वाला कोई और नहीं, बल्कि खुद उसका पति सूरज ही था। पत्नी ने कोर्ट को यह भी बताया था कि एक दिन जब पति देर रात घर लौटा, तो पूछने पर उसने स्वीकार किया कि वह अपनी महिला मित्र 'अंकिता' से मिलकर आ रहा है, जिसके साथ उसके शादी से पहले से शारीरिक संबंध हैं। हालांकि, पति ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया। पत्नी चाहती है साथ रहना, पति कोर्ट के आदेश को नहीं मान रहा
एक तरफ जहां पति झूठे आरोप लगाकर किसी भी कीमत पर तलाक लेना चाहता था, वहीं एक पुलिसकर्मी की बेटी कामिनी ने अपने रिश्ते को बचाने की हर संभव कोशिश की। उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-9 (दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना) के तहत केस दायर किया, जिसका अर्थ है 'साथ रहने का अधिकार'। कोर्ट ने इस मामले में भी कामिनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए डिक्री जारी की। कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को पूरे सम्मान के साथ अपने घर ले जाए और एक पति की तरह उसके साथ रहे। लेकिन, मैनेजर पति अब भी इतना ढीठ है कि वह इस कानूनी आदेश की भी खुलेआम अवहेलना कर रहा है और पत्नी को साथ रखने को तैयार नहीं है। एडवोकेट बोले- ये फैसला बाकियों के लिए भी सबक एडवोकेट के.पी. माहेश्वरी का कहना है कि यह मामला उन सभी लोगों के लिए एक नजीर है जो अपने पद, पैसे और प्रभाव का इस्तेमाल कर कोर्ट को गुमराह करने और कानून को अपनी जेब में रखने की कोशिश करते हैं। बैंक मैनेजर ने न केवल अपनी पत्नी के साथ धोखाधड़ी की, बल्कि उसने भारत की न्याय व्यवस्था के साथ भी एक भद्दा मजाक करने की कोशिश की।
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