सड़क पर बिखरा राजमहल का खजाना:बुंदेला राजाओं के राजगढ़ पैलेस में थी टकसाल; बाजीराव मस्तानी की हुई थी शादी
रात का अंधेरा, हाथों में टॉर्च और इसकी रोशनी में कुछ खोजती आंखें… खजुराहो के पास राजगढ़ गांव की कच्ची सड़क पर आजकल कुछ ऐसा ही नजारा है। यहां मिट्टी में लोग सोना ढूंढ रहे हैं। कुछ दिन पहले हुई बारिश ने जब सड़क पर डाली गई नई मिट्टी को धोया, तो उसमें से सोने के सिक्के चमक उठे। एक बच्चे की नजर क्या पड़ी, पूरे गांव में खजाने की खोज की होड़ मच गई। यह कोई आम जगह नहीं है। पास ही में बुंदेला राजाओं का 800 साल पुराना राजगढ़ पैलेस है, जिसकी दीवारों में महाराजा छत्रसाल, पेशवा बाजीराव और मस्तानी की कहानियां दफ्न हैं। यह कहानी सिर्फ चंद सिक्कों की नहीं, बल्कि इतिहास, किंवदंतियों और एक वीरान हो चुके शाही खजाने की है। भास्कर ने इतिहासकारों, स्थानीय लोगों और बुंदेला राजवंश के जानकारों से बात करके इस रहस्य की परतें खोलने की कोशिश की। पढ़िए रिपोर्ट… मिट्टी में मिला 'सोना', गांव में मची भगदड़
कहानी की शुरुआत बसंत पंचमी के मेले की तैयारी से हुई। गांव के सरपंच रमेश प्रसाद बिल्ला ने बताया, "मेले के लिए रास्ता ठीक करना था, इसलिए हमने दो ट्रैक्टर मिट्टी डलवाई थी। हमारे ड्राइवर ने राजगढ़ पैलेस के पुराने थाने के पास से मिट्टी उठाई थी।" यह वही मिट्टी थी, जिसे 22 जनवरी को पैलेस में स्टाफ क्वार्टर के निर्माण के दौरान खुदाई में निकाला गया था। महल से करीब 300 मीटर दूर सड़क किनारे इस मिट्टी को पाट दिया गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह मिट्टी अपने अंदर सदियों पुराना राज समेटे हुए है। हाल ही में हुई बारिश के बाद जब मिट्टी धुली, तो सोने की तरह चमकते सिक्के सतह पर आ गए। सबसे पहले गांव के एक बच्चे ने इन्हें देखा और फिर यह खबर आग की तरह फैल गई। जिसके हाथ जो लगा, फावड़ा, कुदाल, या लोहे की रॉड, लेकर खजाने की खोज में निकल पड़ा। सरपंच का दावा है, "इसी मिट्टी से 10-12 लोगों को सोने जैसे सिक्के मिले हैं। हम सालों से सुनते आ रहे थे कि यहां सोने के सिक्के और मटके गड़े हैं। हालांकि, हर किसी की किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी। गांव की राधा और हरदास भी इसी मिट्टी में अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे थे, लेकिन उनके हाथ मायूसी ही लगी। हरदास ने बताया, "हमें तो कुछ नहीं मिला, लेकिन सुना है कि कुछ लोगों को रात के अंधेरे में सिक्के मिले थे।" इन्हीं की तरह गांव के सैकड़ों लोग यहां जमा हुए, लेकिन ज्यादातर के हाथ खाली ही रहे। मौके पर 5वीं कक्षा का छात्र पवन लोहे की रॉड से जमीन कुरेदता मिला। उसने मासूमियत से कहा, "मैं खजाना ढूंढ रहा हूं।" राजगढ़ पैलेस: जहां सिक्के ढलते थे
यह घटना जिस राजगढ़ पैलेस के पास हुई, वह कोई मामूली इमारत नहीं है। छतरपुर जिले में मनियागढ़ की पहाड़ियों पर स्थित यह खूबसूरत पैलेस कभी बुंदेला शासकों की आन-बान और शान का प्रतीक था। हरे-भरे बागानों और बारिश के पानी से बनी झील से घिरा यह महल आज भी अपने वैभव की कहानी कहता है। महल में राजा की सुविधा के लिए विभिन्न भवन, तोपखाना, बग्घीखाना और रानियों के लिए नारायण बाग और नजरबाग जैसी बगिया थीं। सबसे खास बात यह है कि इसी पैलेस में सिक्के ढालने की टकसाल भी हुआ करती थी। आज यह पूरा पैलेस ओबेरॉय ग्रुप को लीज पर दिया गया है, जो इसे एक हेरिटेज होटल में तब्दील कर रहा है। छत्रसाल, बाजीराव और मस्तानी का अमर अध्याय
राजगढ़ पैलेस का निर्माण 17वीं-18वीं शताब्दी में मुख्य रूप से महाराजा छत्रसाल और उनके पोते हिंदुपत सिंह बुंदेला के समय का माना जाता है। बुंदेला राजवंश और राजगढ़ के इतिहासकार अनुराग शुक्ला बताते हैं कि 17वीं शताब्दी में महाराजा छत्रसाल ने पन्ना को अपनी राजधानी बनाया था। इसी दौर में एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी, जिसने मराठा और बुंदेला इतिहास को हमेशा के लिए जोड़ दिया। मुगल शासक औरंगजेब की मौत के बाद उसके वंशज मोहम्मद शाह बंगश ने एक बड़ी सेना के साथ बुंदेलखंड पर चढ़ाई कर दी। 1721 में बंगश ने महाराजा छत्रसाल को उनके परिवार सहित जैतपुर के किले में घेर लिया। जब पड़ोसी राज्यों से कोई मदद नहीं मिली, तो छत्रसाल ने पुणे में मराठा पेशवा बाजीराव को मदद के लिए एक मार्मिक संदेश भेजा। यह पत्र मिलते ही बाजीराव अपनी सेना लेकर तूफानी गति से बुंदेलखंड पहुंचे और बंगश को खदेड़ दिया। इस मदद से अभिभूत होकर महाराजा छत्रसाल ने पन्ना में एक भव्य दरबार लगाया। उन्होंने पेशवा बाजीराव को अपना तीसरा पुत्र घोषित किया और अपनी बेटी मस्तानी का विवाह उनसे करा दिया। कहा जाता है कि राजगढ़ पैलेस में आज भी एक 'मस्तानी दरवाजा' मौजूद है, जो इसी रिश्ते की याद दिलाता है। इतिहासकारों के अनुसार, अपनी बेटी की शादी में महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को दहेज में हीरे की दो खदानें, 32 लाख सोने की मोहरें और अनगिनत सोने-चांदी के गहने दिए थे। यही 32 लाख मोहरों की किंवदंती आज भी इस इलाके में खजाने की कहानियों को जिंदा रखे हुए है। क्यों वीरान हुआ राजगढ़ का खजाना?
सवाल उठता है कि अगर इतना बड़ा खजाना था, तो वह महल में क्यों नहीं मिला? इतिहासकार अनुराग शुक्ला इसके पीछे की कहानी बताते हैं। महाराजा छत्रसाल के पोते हिंदूपत सिंह ने 1758 में अपने भाई अमांग सिंह की चित्रकूट में हत्या कर राजगद्दी पर अधिकार कर लिया। लेकिन उनका शासनकाल सुखद नहीं रहा। उनकी रियासत में भयानक अकाल पड़ा, जिसके बाद हैजा और चेचक जैसी महामारियों ने पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया। लोग अपनी जान बचाने के लिए राजगढ़ छोड़कर जाने लगे। हालात इतने खराब हो गए कि खुद राजा हिंदूपत ने पन्ना में एक नया महल बनवाया और राजगढ़ को हमेशा के लिए छोड़ दिया। तो फिर सड़क पर सिक्के कहां से आए?
इतिहासकार अनुराग शुक्ला इस रहस्य से भी पर्दा उठाते हैं। उनका मानना है कि यह सिक्के किसी शाही खजाने का हिस्सा नहीं हैं। वे कहते हैं, "वायरल हो रही तस्वीरों के अनुसार, ये मोहरें मुगलकालीन सिक्के हैं, जिन पर अरबी भाषा में अक्षर खुदे हैं। संभवतः ये सिक्के छत्रसाल महाराज के समय के ही होंगे।" उनका तर्क है कि राजगढ़ उस समय एक संपन्न नगर हुआ करता था, जहां बहुत से अमीर व्यापारी और वणिक रहते थे। हो सकता है कि ये सिक्के किसी व्यापारी के घर में संचित हों, जो समय के साथ जमीन में दब गए। अब जब महल के पास खुदाई हुई, तो वही मिट्टी बाहर आ गई और बारिश के बाद सिक्के दिखने लगे। शुक्ला कहते हैं, "कानपुर से लेकर सागर तक और रीवा से लेकर ग्वालियर तक, यह पूरा क्षेत्र एक समय महाराज छत्रसाल के अधीन था। उनका राजस्व बहुत बड़ा था और राजगढ़ एक महत्वपूर्ण नगर था। इसलिए वहां इस तरह का वैभव होना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन यह किसी बड़े खजाने का संकेत नहीं है।
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