गोला-बारूद, बम बनाने वाले सरेंडर नक्सली बने इलेक्ट्रिशियन-वेल्डर:BGL और IED बनाने के थे एक्सपर्ट, हिड़मा-देवा संग कर चुके काम, बोले-हिंसा में कुछ नहीं रखा

Jan 1, 2026 - 09:44
 0  0
गोला-बारूद, बम बनाने वाले सरेंडर नक्सली बने इलेक्ट्रिशियन-वेल्डर:BGL और IED बनाने के थे एक्सपर्ट, हिड़मा-देवा संग कर चुके काम, बोले-हिंसा में कुछ नहीं रखा
छत्तीसगढ़ का बस्तर अब बदल रहा है। हाथों में AK-47, इंसास, SLR जैसे हथियार पकड़कर जंगल-जंगल घूमने और हिंसा फैलाने वाले नक्सली अब इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर बन रहे हैं। इनमें वे नक्सली भी शामिल हैं, जो संगठन में नक्सली लीडर हिड़मा और देवा के साथ काम कर चुके हैं। नक्सल संगठन की गुरिल्ला आर्मी के लिए हथियार बनाना, हथियारों की मरम्मत करना, BGL और IED बनाने के एक्सपर्ट थे। अब हथियार डालने, हिंसा छोड़ने के बाद इलेक्ट्रिशियन, वेल्डर के अलावा इन्हें राज मिस्त्री, सिलाई, सोलर पंप की भी ट्रेनिंग दी जा रही है। ड्राइविंग भी सिखाई जा रहा रही है। जिससे ये अपने गांव जाकर अपना रोजगार स्थापित कर सकें। दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज में नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा जिले के करीब 106 सरेंडर नक्सलियों की ट्रेनिंग पूरी हो गई है, जबकि 140 की ट्रेनिंग जारी है। इनमें जनमिलिशिया सदस्य से लेकर ACM और DVCM रैंक के भी नक्सली हैं। अगला बैच जल्द तैयार होगा। साल 2025 में पूरे बस्तर रेंज में 1562 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। हालांकि, अब तक उन्हें कोई सीधी नौकरी या रोजगार नहीं मिला है, क्योंकि हथियार डालते ही नौकरी देने का कोई प्रावधान नहीं है। सरकार की ओर से पैसे सीधे नहीं दिए जाते, बल्कि आजीविका के लिए इच्छुक नक्सलियों को प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है। इसके साथ ही रहने, खाने और ट्रेनिंग का पूरा खर्च शासन उठाता है। रोजगार शुरू करने के लिए लोन का प्रावधान है, लेकिन लंबी प्रक्रिया और दस्तावेजों की कमी के कारण फिलहाल किसी ने लोन नहीं लिया है। पहले देखिए ये तस्वीरें- बस्तर के अलग-अलग इलाकों में एक्टिव रहे नक्सली ये सभी नक्सली बस्तर के अलग-अलग इलाकों में सक्रिय रहे हैं। ज्यादातर नक्सली इंद्रावती एरिया कमेटी, माड़ डिवीजन में सक्रिय रहे हैं। IED ब्लास्ट, सड़क काटना, फोर्स पर हमला करने जैसी वारदातों में ये शामिल रहे हैं। साल 2024-25 में माओवादियों के सरेंडर और एनकाउंटर के बाद अब साल 2026 में बस्तर की आबो हवाओं में बम-धमाकों की गूंज, बारूद की गंध नहीं बल्कि शांति होगी। 2026 से बदलते बस्तर की शुरुआत हो रही है। पढ़िए सरेंडर नक्सलियों की कहानी उनकी ही जुबानी... 1. मेरा नाम मंगू है। बीजापुर जिले के मालेपल्ली इलाके का रहने वाला हूं। बचपन में ही नक्सल संगठन में शामिल हो गया था। दक्षिण बस्तर डिवीजन में सक्रिय था। नक्सलियों ने मुझे बंदूक बनाने, बंदूक रिपेयर करने और IED के साथ ही BGL सेल बनाने की ट्रेनिंग दी थी। इस काम में जब माहिर हुआ तो बड़े लीडर्स ने नक्सल संगठन की गुरिल्ला आर्मी के लिए हथियार और IED बनाने का काम दिया। मैंने करीब 1 हजार से ज्यादा IED और BGL सेल बनाए हैं। AK-47, इंसास, 303 जैसे भी हथियार चलाता हूं। 2 साल तक हिड़मा दादा (माड़वी हिड़मा) के साथ काम किया था। देवा बारसे जब दरभा डिवीजन में था तब मैं उसके साथ भी काम कर चुका हूं। शादीशुदा हूं। पत्नी गांव में ही रहती है। नक्सल संगठन में 10 साल बिताने के बाद मैं घर लौट आया। यदि गांव में ही रहता तो नक्सली मुझे मार देते। इसलिए साल 2024 में सरकार के सामने हथियार डाल दिया। हिंसा में कुछ नहीं रखा है। परिवार के साथ रहकर जीना-खाना चाहता हूं। 3 बच्चे हैं उनकी परवरिश भी करनी है। 2. मेरा नाम विष्णुराव ओयामी है। इंद्रावती नदी पार स्थित गांव रेकावाया का रहने वाला हूं। साल 2007 में नक्सल संगठन से जुड़ा। उसी इलाके में सक्रिय रहा। पहले CNM (चेतना नाट्य मंडली) में था, फिर बाद में प्रमोशन कर ACM कैडर का पद दिया गया। नक्सली मधु और सपना के साथ काम किया हूं। अक्टूबर साल 2025 में मैंने आत्मसमर्पण किया है। पत्नी भी नक्सल संगठन में रही। अब दंतेवाड़ा में इलेक्ट्रिक वर्क सीख रहा हूं। पत्नी घर में है। नक्सल संगठन में हथियार चलाने का पैसा नहीं मिलता था। लेकिन अब ये काम सीखने के बाद खुद का रोजगार स्थापित करूंगा। 3. मेरा नाम घासीराम है। बीजापुर जिले के ताकिलोड़ गांव का रहने वाला हूं। कक्षा तीसरी तक पढ़ाई किया हूं। बचपन में ही नक्सली मुझे अपने साथ लेकर चले गए थे। सरेंडर से पहले तक प्लाटून कमांडर था। नक्सली लीडर और सेंट्रल कमेटी मेंबर रामधेर के साथ काम किया हूं। नक्सलियों के लिए खाने की व्यवस्था करने समेत अन्य काम का जिम्मा था। इंद्रावती नदी पार के इलाके में सक्रिय था। साल 2025 में मैंने सरेंडर किया है। अब परिवार चलाने आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है। पहले मैंने राज मिस्त्री का काम सीखा। दंतेवाड़ा SP गौरव राय से सीधी बात सवाल- सरेंडर करने के बाद इन नक्सलियों को रोजगार से किस प्रकार जोड़ा जा रहा है? जवाब- हम लगातार नक्सलियों से अपील कर रहे हैं कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ दें, हथियार डाल दें। पूरे बस्तर रेंज में पुलिस पूना मार्गेम अभियान चला रही है। इसी अभियान के तहत नक्सलियों ने शासन-प्रशासन पर भरोसा जताया और साल 2025 में ज्यादा सरेंडर किया है। छत्तीसगढ़ शासन की पुनर्वास नीति के तहत जो भी सरेंडर करता है, उन्हें 50 हजार रुपए दिए जाते हैं। साथ ही उनके कौशल विकास के लिए लाइवलीहुड कॉलेज में ट्रेनिंग दिलवा रहे हैं। सिलाई, कार पेंटर, मैकनिक, प्लबिंग, वेल्डिंग समेत अन्य विधाओं की ट्रेनिंग दिलवा रहे हैं। इनका स्किल डेवलप किया जा रहा है। जिससे इन्हें रोजगार से जोड़ा जा सके। सवाल- जिन सरेंडर नक्सलियों को ट्रेनिंग दी जा रही है ये कौन-कौन से कैडर के हैं? जवाब- बीजापुर और नारायणपुर के ज्यादातर नक्सली हैं, जिन्होंने दंतेवाड़ा में सरेंडर किया है। इनमें जन मिलिशिया से लेकर DVCM रैंक तक के नक्सली हैं। सवाल- ट्रेनिंग देने के बाद फिर क्या? कैसे इन्हें रोजगार देंगे? जवाब- हम उन्हें पूरी तरह से तैयार कर रहे हैं। हमारी कोशिश रहेगी की जो भी काम हो हम उनमें इन्हें शामिल करेंगे। जगदलपुर में कैफे चला रहे नक्सली जगदलपुर में सरेंडर नक्सली और नक्सल हिंसा पीड़ित परिवार के लोग फास्ट फूड कैफे चला रहे हैं। इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने और आर्थिक स्थिति मजबूत करने रोजगार के लिए पंडुम कैफे की शुरुआत की गई है। इसका सारा स्ट्रक्चर सरकार ने तैयार किया है। अब ये इसका संचालन कर पैसे कमाने लग गए हैं। इसके लिए इन्हें ट्रेनिंग भी दी गई है। कुल 13 लोगों को कैफे की चाबी थमाई गई है। जिसमें 8 नक्सल हिंसा पीड़ित हैं, 5 लोग सरेंडर नक्सली हैं। इन 13 लोगों में 8 महिलाएं भी शामिल हैं। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत तैयार किया गया यह कैफे नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवारों और आत्म समर्पित माओवादी कैडरों के लिए आजीविका प्रदान करने वाला एक मॉडल है।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0