मजदूर कम-पानी की समस्या तो लाइन बोनी, DSR तकनीक कारगर:तकनीक के इस्तेमाल से पारंपरिक खेती की तुलना में 40% खर्च कम, उत्पादन भी बेहतर

Jun 9, 2026 - 08:34
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मजदूर कम-पानी की समस्या तो लाइन बोनी, DSR तकनीक कारगर:तकनीक के इस्तेमाल से पारंपरिक खेती की तुलना में 40% खर्च कम, उत्पादन भी बेहतर
धान की खेती में बोनी भी महत्वपूर्ण अंग है। यदि बोनी सही समय, तरीके और तकनीक से की गई, तो यह फायदा देगी, नहीं तो किसान का बड़ा नुकसान कर सकती है। वर्तमान समय में लाइन बोवनी, सीड ड्रिल मशीन एवं डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक किसानों के लिए कम लागत, कम पानी और कम मजदूरी में अधिक उत्पादन देने वाली कारगर तकनीक साबित हो रही है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी है जहां मजदूरों की कमी एवं सिंचाई जल की समस्या रहती है। धान की पारंपरिक खेती करने प्रति हेक्टेयर 75 से 80 किलो बीज की जरूरत होती है, लेकिन नई तकनीक से 30 से 35 किलो बीज ही लगता है। नई तकनीक से मिट्‌टी सुरक्षित रहती है। कतार में बोनी होने की वजह से पौधों को धूप, खाद बेहतर ढंग से मिलती है। इससे पौधे मजबूत होते हैं। पारंपरिक खेती करने पर सीधे बीज के छिड़काव और रोपा में लागत ज्यादा लगती है, लेकिन नई तकनीक से बीज कम लगने से लागत भी कम लगती हैं। इससे पारंपरिक खेती की तुलना में 40 प्रतिशत तक बचत होती है। लाइन बोनी के लाभ: फसल की अच्छी वृद्धि - लाइन बोनी में फसल की बुवाई निश्चित दूरी एवं कतारों में की जाती है। यह कार्य सीड ड्रिल मशीन या हाथ से की जा सकती है। - लाइन में बुवाई करने से पौधों को पर्याप्त पोषण, प्रकाश एवं हवा मिलती है, जिससे फसल की वृद्धि अच्छी होती है। - इस तकनीक से बीज की बचत होती है। पौधों की समान वृद्धि होती है। खरपतवार नियंत्रण आसान होता है। उर्वरक एवं सिंचाई प्रबंधन बेहतर होता है। मशीन से निराई-गुड़ाई में सुविधा मिलती है। डायरेक्ट सीडेड राइस के फायदे - डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) तकनीक में धान की नर्सरी तैयार कर रोपाई करने के बजाय बीज को सीधे खेत में बोया जाता है। - इसमें सीड ड्रिल मशीन या जीरो टिल सीड ड्रिल का उपयोग किया जाता है। - इस तकनीक से खेती में समय एवं श्रम दोनों की बचत होती है। मजदूरी राशि कम लगती हैं। जानें, प्रति हेक्टेयर कितने बीज की जरूरत - बीज दर - लाइन बोवनी एवं सीड ड्रिल तकनीक से बुवाई के लिए सामान्यतः 40 से 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त माना जाता है। कुछ परिस्थितियों में 60 किलोग्राम तक बीज का उपयोग किया जा सकता है। - बुवाई की विधि - सीड ड्रिल से कतारों में बुवाई करें। कतार से कतार की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर रखें। पौधे से पौधे की दूरी 5 से 7 सेंटीमीटर रखें। बीज की गहराई 2 से 3 सेंटीमीटर रखें। उर्वरक प्रबंधन - सामान्यतः प्रति हेक्टेयर इतने खाद का इस्तेमाल करें नाइट्रोजन (N) - 100 से 120 किलोग्राम फास्फोरस (P) - 50 से 60 किलोग्राम पोटाश (K) - 40 से 50 किलोग्राम सिंचाई प्रबंधन - बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। खेत में लगातार पानी भरकर रखने की आवश्यकता नहीं होती। आवश्यकता अनुसार हल्की सिंचाई करें। डीएसआर तकनीक से 15 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है। खरपतवार नियंत्रण - डीएसआर में खरपतवार सबसे बड़ी समस्या होती है, इसलिए समय पर नियंत्रण आवश्यक है। बुवाई के 1 से 3 दिन के भीतर प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशी का छिड़काव करें। 20 से 25 दिन बाद पोस्ट-इमर्जेंस दवा का उपयोग करें। आवश्यकता पड़ने पर हाथ से निराई-गुड़ाई करें। सीड ड्रिल से बुवाई, इससे 15 से 20 फीसदी ज्यादा उत्पादन बालोद जिले के ग्राम भरदाखुर्द के किसान प्रदीप साहू बताते हैं कि वे 10 साल से नई तकनीक यानी सीड ड्रिल के जरिए धान की बुवाई कर रहे हैं। इससे खेती में लाभ मिल रहा है। वे बताते हैं कि इस तकनीक से बीज बोने पर बियासी नहीं करना पड़ता। कटाई में सहूलियत होती हैं। मिट्टी की संरचना भी अच्छी बनी रहती है। निंदाई में सुविधा रहती है। छिड़काव विधि की तुलना में उपज ज्यादा होती है। पारंपरिक खेती की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत पैसे की बचत तो होती ही है, साथ ही 15 से 20 प्रतिशत उत्पादन में बढ़ोतरी भी होती है।

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