साइंटिस्ट पति का आरोप, प्रोफेसर पत्नी ने बेलन-चप्पल से मारा:पत्नी बोली- वे गुस्सैल स्वभाव के, फैमिली कोर्ट पहुंचा बेटी की कस्टडी का मामला
संतान न तो माता-पिता की संपत्ति है और न खिलौना। उसके भी अपने अधिकार हैं, अपनी इच्छाएं हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। ये टिप्पणी इंदौर फैमिली कोर्ट की है। दरअसल, एक दंपती ने 15 साल की बच्ची की कस्टडी को लेकर फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने पति और पत्नी दोनों की दलील सुनने के बाद आठ साल बाद पत्नी के हक में फैसला सुनाया है। बच्ची की कस्टडी मां को मिलेगी। इस दौरान कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में 'ह्यूमन टच' यानी मानवीय स्पर्श की जरूरत होती है। खास बात ये है कि पति इंदौर के राजा रामन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केंद्र (RRCAT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में एक वैज्ञानिक है जबकि उनकी पत्नी श्री गोविंदराम सेकसरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस में प्रोफेसर हैं। आखिर क्या है पूरा मामला और फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला क्यों दिया? पढ़िए रिपोर्ट... साल 2017 से रिश्तों में आई दरार
मंथन और आरती दोनों की शादी को 14 साल हुए थे कि दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आना शुरू हुई। आपसी कलह इतनी बढ़ी कि इसने ‘परफेक्ट फैमिली’ की तस्वीर को धुंधला कर दिया। साल 2017 में पति मंथन ने फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका थी-अपनी छोटी बेटी की कस्टडी हासिल करने की। यहीं से शुरू हुई एक लंबी और भावनात्मक कानूनी लड़ाई, जो आठ साल तक चली। पति की दलील: पत्नी बेटी को सही माहौल नहीं दे रही
वैज्ञानिक मंथन ने अदालत के सामने अपनी याचिका में एक चिंतित पिता की छवि पेश की। उन्होंने दलील दी कि उनकी प्रोफेसर पत्नी आरती अपने करियर और व्यस्तताओं में इस कदर उलझी हैं कि वह छोटी बेटी को एक स्वस्थ और सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रही हैं। कोर्ट में पति के मुख्य आरोप लापरवाही और अकेलापन: मंथन ने आरोप लगाया कि आरती अक्सर बेटी को घर में अकेला बंद करके कॉलेज चली जाती हैं। इस वजह से बच्ची मोबाइल पर निर्भर हो गई है और उसकी पढ़ाई-लिखाई और दिनचर्या पूरी तरह से बिगड़ गई है। बेहतर भविष्य का वादा: उन्होंने कोर्ट से गुहार लगाई कि बेटी का संरक्षण उन्हें सौंपा जाए। उन्होंने अपने वैज्ञानिक पेशे, अनुशासित जीवनशैली और स्थिर पारिवारिक वातावरण का हवाला देते हुए कहा कि वह बेटी की शिक्षा और मानसिक विकास के लिए हर तरह से बेहतर विकल्प हैं। भावनात्मक जुड़ाव: मंथन ने कोर्ट को बताया कि वह बेटी को तनावमुक्त रखने के लिए उसके साथ खेलते थे, उसे घुमाने ले जाते थे और बेटी उनके साथ बेहद खुश रहती थी। उन्होंने बेटी के लिए स्केटिंग शूज मंगवाकर दिए थे, लेकिन पत्नी उसे नियमित अभ्यास के लिए नहीं ले जाती थी, जिससे उसकी प्रतिभा दब रही थी। घरेलू हिंसा और प्रताड़ना: पति ने पत्नी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह हमेशा झगड़ा करती है और आत्महत्या करने की धमकी देती है। उन्होंने दो घटनाओं का विशेष रूप से जिक्र किया—अगस्त 2013 में जब वह बेटी को पानी पिलाने ले गए तो पत्नी ने उन पर बेलन से हमला किया, और अक्टूबर 2016 में चप्पल से मारा, जिसकी शिकायत उन्होंने पुलिस थाने में भी की थी। पत्नी का जवाब: 'पति गुस्सैल हैं, उनके साथ डरती है बेटी'
प्रोफेसर आरती ने पति के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी कहानी का एक बिल्कुल अलग पक्ष अदालत के सामने रखा। उन्होंने पति को एक गुस्सैल और अस्थिर स्वभाव का व्यक्ति बताया, जिसके साथ बेटी का रहना सुरक्षित नहीं है। पत्नी के मुख्य तर्क पति का गुस्सैल स्वभाव: आरती ने कहा कि मंथन अत्यंत गुस्सैल प्रवृत्ति के हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर झल्ला उठते हैं और अक्सर बच्चियों के सामने ही झगड़ा और गाली-गलौज करते हैं। इस वजह से बेटी उनसे डरी-सहमी रहती है और उनके साथ बिल्कुल नहीं रहना चाहती। अनुशासन के नाम पर दबाव: उन्होंने दलील दी कि पति अनुशासन के नाम पर बच्ची पर अनावश्यक दबाव डालते हैं, जिससे वह और डर जाती है। अस्थिर जीवनशैली: उन्होंने कोर्ट को बताया कि एक वैज्ञानिक होने के नाते पति का शेड्यूल बहुत व्यस्त है। वह सुबह 7 बजे घर से निकलते हैं और रात 8 बजे लौटते हैं। ऐसे में वह बेटी को समय कैसे दे पाएंगे? उन्होंने यह भी कहा कि पति ने अपना स्थायी निवास छोड़ दिया है और वर्तमान में उनका कोई ठिकाना नहीं है। बेटी की परवरिश और सफलता: आरती ने अपनी योग्यता का हवाला देते हुए कहा कि वह खुद पोस्ट ग्रेजुएट हैं और बेटी को अच्छी तरह पढ़ाती हैं। अदालत ने जानी बेटी की इच्छा
जब माता-पिता के आरोप-प्रत्यारोप के बीच ये समझ नहीं आया कि सच क्या है? तो अदालत ने अहम फैसला लिया। जिसके भविष्य का सवाल था यानी छोटी बेटी उसी से उसकी इच्छा जानी गई। कोर्ट के चैंबर में, एक शांत और सुरक्षित माहौल में, बच्ची से उसकी इच्छा पूछी गई। बच्ची ने बिना किसी हिचकिचाहट के साफ शब्दों में कहा, 'मैं मम्मी के साथ ही रहना चाहती हूं।' उसने अपनी मां को अपनी स्क्वैश की सफलता का श्रेय दिया और बताया कि कैसे उसकी मां उसके खान-पान से लेकर होमवर्क तक हर चीज में उसकी मदद करती है। बच्ची की इस स्पष्ट और दृढ़ इच्छा ने केस को एक निर्णायक मोड़ दे दिया। अदालत का फैसला: कानून से ऊपर 'मानवीय स्पर्श'
फैमिली कोर्ट ने इस मामले में सिर्फ कानूनी दस्तावेजों और गवाहियों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दी। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक आदेशों का हवाला दिया, जिनमें रोसी जैकब बनाम जैकब ए. चक्रामक्कल (1973) और गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल (2009) जैसे मामले शामिल थे। ये मामले स्थापित करते हैं कि बच्चे की कस्टडी के मामलों में उसका कल्याण ही एकमात्र और सर्वोपरि मापदंड होना चाहिए। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में लिखा- "संतान केवल स्थायी संपत्ति नहीं होती। वह कोई वस्तु नहीं है जिसे माता-पिता अपने मन मुताबिक बांट लें। बच्चे का कल्याण, उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और नैतिक विकास—ये ही असली मापदंड हैं। न्यायालय का दायित्व केवल पेरेंट्स तय करना नहीं, बल्कि बच्चे के कल्याण की रक्षा करना है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में 'ह्यूमन टच' यानी मानवीय स्पर्श की आवश्यकता होती है। अंतिम आदेश और एक संदेश
एडवोकेट प्रतीक माहेश्वरी के अनुसार, सभी पक्षों को सुनने और विशेष रूप से बेटी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने आदेश दिया कि: छोटी बेटी अपनी मां आरती के संरक्षण में ही रहेगी। पिता मंथन को हर महीने के तीसरे शनिवार को बेटी से मुलाकात की अनुमति होगी, लेकिन यह मुलाकात मां की उपस्थिति में ही होगी। पिता फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से भी बेटी से बात कर सकेंगे। अदालत ने अपने फैसले में एक टिप्पणी लिखी- बच्चे न तो माता-पिता की संपत्ति हैं, न खिलौने, जिन्हें वे अपनी इच्छानुसार इस्तेमाल करें।
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