बागेश्वर धाम में अब शस्त्र–शास्त्र की भी शिक्षा:वैदिक गुरुकुलम में राम-कृष्ण परंपरा से जुड़ेंगे बटुक, बनारस के पांच विद्वान पढ़ा रहे
खजुराहो के बागेश्वर धाम में हिंदू गांव, कैंसर अस्पताल के बाद अब शस्त्र और शास्त्र की भी शिक्षा दी जाएगी। 13 फरवरी 2026 को कथावाचक रमेश भाई ओझा, पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और पंडित प्रदीप मिश्रा ने मिलकर वैदिक गुरुकुलम की शुरुआत की। इस गुरुकुल में हर जाति के छात्रों को शिक्षा मिलेगी। मुख्य उद्देश्य है- बटुकों को सनातन धर्म, राम-कृष्ण परंपरा और वैदिक संस्कृति से जोड़ना। यहां तीन मंजिला इमारत बनी है, जिसमें अभी 50 बटुकों को प्रवेश दिया गया है। कक्षाएं भी शुरू हो चुकी हैं। इसमें बनारस से आए शिक्षक पढ़ा रहे हैं। धाम से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर सुनसान इलाके में बनी यह तीन मंजिला इमारत अब लोगों को दूर-दूर से आकर्षित कर रही है। दैनिक भास्कर की टीम ने खुद बागेश्वर धाम पहुंचकर इस ड्रीम प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी जुटाई। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… सुबह 4 बजे से ही आने लगती है शंख की आवाज तड़के चार बज रहे हैं। गुरुकुल के अंदर से शंख बजने की आवाज आने लगती है। इतने में ही एक-एक कर सभी कमरों की लाइट जलने लगती है। इसके बाद चंद मिनटों में एक मंत्री की आवाज साफ-साफ सुनाई देती है। यहां शिक्षा लेने आए छात्र और दूसरे लोग ‘कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।, करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥’ का जप कर रहे हैं। ये वही मंत्र है, जिसे सुबह उठकर सबसे पहले अपने हाथों की हथेली देखते हुए किया जाता है। इसी परिसर में बागेश्वर धाम की गोशाला भी स्थित है। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहां 10 कमरों के साथ विशाल हॉल बनाया गया है। परिसर में ही बागेश्वर बालाजी और अन्य देवी-देवताओं का मंदिर भी है। 10 मिनट ही हुए होंगे, गुरुकुल में चहल-पहल शुरू हो जाती है। छात्र अपने-अपने कपड़े लेकर वॉशरूम की ओर जाने लगते हैं। वहां मौजूद सेवादार ऋषि शुक्ला से पूछा- इतनी सुबह-सुबह सभी नहाने क्यों जा रहे हैं? वह कहते हैं- ये तो गुरुकुल की परंपरा है। 5 बजे से सबको सुबह की पूजा-पाठ शुरू करनी है। ठीक पांच बजे से कुछ मिनट पहले छात्रावास के बरामदे में छात्र अपना-अपना आसन और पूजन के लिए छोटे से तांबे के कलश में जल लेकर आ गए। पूजा-पाठ शुरू कर देते हैं। सुबह छह बजे के करीब पूजन-पाठ पूरा कर लिया। इसके बाद सभी ने एक-दूसरे को देखा। कुछ सहमति बनाते हुए जोर-जोर से हनुमान चालीसा गाने लगे। बनारस से आए हैं शिक्षक गुरुकुलम के प्रधानाचार्य आचार्य गोपाल चरण पांडे 'राजा शास्त्री' बताते हैं कि गुरुकुल का अर्थ ही है 'गुरु का घर'। भगवान राम ने वशिष्ठजी और श्रीकृष्ण ने सांदीपनि आश्रम जाकर शिक्षा ली थी। इसके बाद सदियों से ये परंपरा चली आ रही है। इस गुरुकुल में भी वही नियम हैं। अभी 50 बच्चों यहां प्रवेश ले चुके हैं। गुरुकुल में शिक्षा लेने आए बच्चों को बटुक कहा जाता है। फिलहाल गुरुकुलम में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और नेपाल के बटुक शामिल हैं। 20 कमरों में शिक्षक और ब्राह्मणों के रहने की व्यवस्था की गई है। ब्राह्मण बटुक सागर अधिकारी ने बताया कि मैं नेपाल के काठमांडू का रहने वाला हूं। यहां शस्त्र और वेद की शिक्षा ले रहा हूं। भविष्य में भगवताचार्य बनना चाहता हूं। सभी तरह की शिक्षा दी जाएगी आचार्य गोपाल चरण कहते हैं कि स्कूलों में शायद किताबी ज्ञान मिल जाए, लेकिन संस्कार केवल गुरुकुल में मिलते हैं। यहां विद्यार्थियों को सिखाया जाएगा कि कब उठना है, कब सोना है और कैसे मर्यादित जीवन जीना है। पाठ्यक्रम में केवल वेद-पुराण ही नहीं, बल्कि धनुर्विद्या, आयुर्वेद, ज्योतिष और प्राचीन मल्लविद्या भी शामिल होगी। वर्तमान में 5 शिक्षकों और 50 विद्यार्थियों से शुरुआत की गई है, जिसे आगे चलकर 250 विद्यार्थियों तक बढ़ाया जाएगा। अभी बटुकों को दिनचर्या और संस्कार सिखाए जा रहे हैं। अप्रैल से रेगुलर नियमित शिक्षा शुरू की जाएगी। शस्त्र की शिक्षा भी अप्रैल से ही शुरू होगी। भविष्य में 'वैदिक सनातन बोर्ड' से मान्यता प्राप्त शास्त्री और आचार्य की डिग्रियां भी यहां से दी जाएंगी। धीरेंद्र शास्त्री बोले- भावी पीढ़ी बने संस्कारवान-ज्ञानवान गोपाल चरण कहते हैं, बागेश्वर धाम पीठाधीश पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का संकल्प है कि भावी पीढ़ी को संस्कारवान और ज्ञानवान बनाया जाए। उनका कहना है कि भोजन और धन का सहारा सीमित समय का होता है, लेकिन विद्या का दान जीवन भर काम आता है। मस्तक पर तिलक धारण करने से लेकर माता-पिता को प्रणाम करने तक के संस्कार इसी सनातनी विद्या से मिलेंगे। काशी के आचार्य कृष्ण कुमार दीक्षित (वेद), शिवम कुमार पांडे (ज्योतिष), दिव्यांशु द्विवेदी (व्याकरण) और प्रियांशु पांडे (यजुर्वेद) यहां बटुकों को शिक्षित करेंगे। आने वाले समय में देश के अन्य बड़े मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर भी इसी तरह के गुरुकुल स्थापित करने की योजना है। देशभर में बनाए जाएंगे गुरुकुल सेवादार ऋषि शुक्ला कहते हैं कि गुरुकुल का उद्देश्य युवा पीढ़ी को नशा, जुआ और अपराध जैसी बुराइयों से बचाकर उनका सर्वांगीण विकास करना है। यहां शिक्षा के साथ-साथ तीरंदाजी, साधना और योगासन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। विद्यार्थियों की दिनचर्या भी अनुशासित होगी, जो सुबह 4 बजे जागरण से शुरू होकर रात 9:30 बजे शयन पर समाप्त होगी। इसमें तीन समय की संध्या, स्वाध्याय और बाल भोग का विशेष समय निर्धारित है। यह कोई सामान्य कोचिंग नहीं, बल्कि पूरा बोर्ड होगा। यहां 6वीं से 8वीं तक को 'प्रथमा', 9वीं-10वीं को 'पूर्व मध्यमा', 11वीं-12वीं को 'उत्तर मध्यमा' और ग्रेजुएशन को 'शास्त्री' कहा जाएगा। इसके बाद दो साल का 'आचार्य' कोर्स होगा। ये सभी डिग्रियां वैदिक सनातन बोर्ड से मान्यता प्राप्त होंगी। कैसी होती गुरुकुल की दिनचर्या गुरु-शिष्य संबंध- इस प्रणाली का केंद्रबिंदु गुरु और शिष्य के बीच घनिष्ठ, व्यक्तिगत और आत्मीय संबंध है। शिष्य, गुरु के परिवार के सदस्य की तरह रहते हैं। गुरु उन्हें बेटे की तरह स्नेह देते हैं। यह संबंध आपसी सम्मान, विश्वास और समर्पण पर आधारित रहता है। ब्रह्मचर्य- विद्यार्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, आमतौर पर 8 से 25 वर्ष की आयु तक, गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं। निःशुल्क शिक्षा- गुरुकुल की शिक्षा पूरी तरह से निःशुल्क होती है। इसका संचालन समाज द्वारा दिए गए दान या किसी के संरक्षण से होता है। शिक्षा पूरी होने पर शिष्य अपनी क्षमतानुसार गुरु को गुरु दक्षिणा देते हैं। सामुदायिक जीवन और अनुशासन- छात्र आश्रम के दैनिक कार्यों में गुरु की मदद करते थे, जैसे लकड़ी लाना, भिक्षा मांगना, भोजन पकाना आदि। इन कार्यों से उनमें शारीरिक श्रम, अनुशासन, आत्मनिर्भरता और सेवा भाव के मूल्यों का विकास होता है। व्यक्तिगत ध्यान- गुरु प्रत्येक शिष्य की क्षमता, रुचि और ग्रहणशीलता के अनुसार उसे व्यक्तिगत मार्गदर्शन देते हैं। जिसे आज "Student-centric learning" कहा जाता है। कैसे होते हैं गुरुकुल? गुरुकुल प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के आवासीय विद्यालय होते थे, जहां शिष्य गुरु के घर या आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। यह शिक्षा की एक परंपरा है जहां गुरु-शिष्य संबंध, नैतिक चरित्र निर्माण, व्यावहारिक ज्ञान, प्रकृति से जुड़ाव और सर्वांगीण विकास पर जोर दिया जाता है, जिसे जीवन शैली का एक हिस्सा माना जाता है। कैसे पढ़ाई होती थी
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