बारिश में टापू बन जाते हैं भिंड के गांव:ग्रामीण बोले- बहू-बेटियों और बच्चों को लेकर रातों-रात भागना पड़ता है; इनके उजड़ने-बसने की कहानी

Jul 4, 2026 - 09:48
 0  0
बारिश में टापू बन जाते हैं भिंड के गांव:ग्रामीण बोले- बहू-बेटियों और बच्चों को लेकर रातों-रात भागना पड़ता है; इनके उजड़ने-बसने की कहानी
पानी बरसत है। मोरो जी घबरान लगत है। सिंध नदी हमाए गांव को चारों ओर से घेर लेत है। सब कछु छोड़-छाड़ के भागनो पड़त है। जाको जौ सामान मिल जात है, वा उठाय के चल देत है। हर साल हमाए गृहस्थी बह जात है। कोऊ सुनन वालो नइयां…। ये दर्द भरे शब्द भिंड जिले के इंदुर्खी गांव की गड्डी बाई के हैं। स्थानीय बोली में कही गई यह बात सिंध नदी किनारे बसे गांवों की हकीकत बयान करती है। पिछले चार वर्षों से बरसात आते ही सिंध नदी उफान पर आ जाती है। घरों में पानी भर जाता है और सैकड़ों परिवारों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है। एक बार फिर बादल मंडराने लगे हैं। इसे देखते ही नदी किनारे बसे गांवों में डर लौट आया है। दैनिक भास्कर की टीम ऐसे ही बाढ़ प्रभावित गांवों में पहुंची। खेती और पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण फिर से जरूरी सामान समेटने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि हर बारिश नई मुसीबत लेकर आती है। भास्कर टीम ने रिपोर्टिंग की शुरुआत भिंड मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर इंदुर्खी गांव से की। पढ़िए रिपोर्ट… इन तस्वीरों में देखे गांव के हालात… कभी समृद्ध था इंदुर्खी, अब बाढ़ से पहचान इंदुर्खी कभी रौन क्षेत्र का समृद्ध गांव था। यहां पुलिस चौकी, साप्ताहिक हाट और पशु मेला लगता था। लेकिन लगातार आती बाढ़ ने गांव की तस्वीर बदल दी। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार कस्बों और शहरों में बस गए। इसके बावजूद गांव की आबादी आज भी चार से पांच हजार के बीच है। सबसे ज्यादा असर ढीमर मोहल्ले पर पड़ता है। सिंध नदी से करीब 500 मीटर दूर यह बस्ती जलस्तर बढ़ते ही टापू बन जाती है। बाढ़ बढ़ने पर ग्रामीण कढ़ाहा, मटका और ट्रैक्टर के ट्यूब की मदद से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचते हैं। वे सिर्फ जरूरी सामान ही साथ ले जा पाते हैं। लौटते हैं तो घर दलदल बन चुका होता है इंदुर्खी के लिए बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर साल नई शुरुआत की मजबूरी है। गांव के मेघराज बाथम बताते हैं कि पानी उतरने के बाद पूरा घर दलदल बन जाता है। कई दिन सफाई और मरम्मत में लगते हैं। घनश्याम बाथम कहते हैं, “बहू-बेटियन और बच्चन को लेकर रातों-रात भागनो पड़त है। घर-मड़ैया डूब जात हैं, सब कछु बर्बाद हो जात है।” बाढ़ के दौरान थम जाती है गांव की जिंदगी स्कूल, पंचायत भवन और अन्य सरकारी इमारतें भी पानी की चपेट में आ जाती हैं। कई बार सरकारी रिकॉर्ड तक खराब हो जाते हैं। रोजगार की कमी और लगातार बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत और राजस्थान के शहरों में काम करने चले गए हैं। ज्यादातर लोग पेंट और पानी की टंकियों की पॉलिश का काम करते हैं। उनका कहना है कि गांव में रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। बड़ी और छोटी मड़वारी भी हर साल प्रभावित सिंध किनारे बसे बड़ी मड़वारी और छोटी मड़वारी गांवों में बाढ़ का पानी सबसे पहले पहुंचता है। लोगों को सबसे पहले गांव खाली करना पड़ता है। भास्कर टीम जब बड़ी मड़वारी पहुंची तो महिलाएं समूह में चर्चा कर रही थीं और ग्रामीण पेड़ की छांव में बैठे थे। बातचीत में हर किसी ने बाढ़ से जुड़ी अपनी परेशानी बताई। गिरवासा गांव: सिंध नदी का पहला प्रहार दतिया सीमा से लगा गिरवासा गांव सिंध नदी की बाढ़ से सबसे पहले प्रभावित होता है। शिवपुरी से निकलकर दतिया के सेंवढ़ा होते हुए नदी भिंड जिले की लहार विधानसभा में प्रवेश करती है और सबसे पहले गिरवासा पहुंचती है। जलस्तर बढ़ते ही यहां पानी भरना शुरू हो जाता है, जिसके बाद असर लिलवारी गांव तक पहुंचता है। पर्याचय और मटियावली भी हर साल संकट में लहार और दतिया सीमा पर बसे पर्याचय और मटियावली गांव भी हर साल बाढ़ झेलते हैं। कई बार केशवगढ़ क्षेत्र तक पानी पहुंच चुका है। इसलिए बारिश के दिनों में ग्रामीण हर समय सतर्क रहते हैं। पिढौरा, बघेली बहादुरपुरा और आसपास के गांव रौन क्षेत्र के पिढौरा, बघेली बहादुरपुरा और मढ़ैयन समेत कई गांव हर साल बाढ़ की चपेट में आते हैं। कई बार घरों तक पानी पहुंच जाता है। मेहगांव क्षेत्र के छोटी भारौली, बड़ी भारौली और गोरम गांव भी पिछले तीन-चार वर्षों से लगातार प्रभावित हैं। खैरा-श्यामपुरा: जंगल में बितानी पड़ती हैं रातें भिंड विधानसभा के खैरा और श्यामपुरा गांवों में भी हर साल बाढ़ आती है। पिछले साल कई घरों में पानी भरने के बाद लोगों को जंगल में रातें बितानी पड़ी थीं। जखमौली, टहनगुर और ककहारा गांवों में भी बारिश के दौरान ऐसे ही हालात बनते हैं। दो बांधों का पानी छोड़ते ही बढ़ता है खतरा सिंध नदी का उद्गम शिवपुरी जिले के जंगलों में है। बरसात के दौरान मोहिनी सागर और मढ़ीखेड़ा बांध भरने पर उनका पानी छोड़ा जाता है। एक बांध का पानी छोड़ने पर स्थिति सामान्य रहती है, लेकिन दोनों बांधों से एक साथ पानी छोड़े जाने पर नदी उफान पर आ जाती है। 2021 की भीषण बाढ़ में दतिया और भिंड के पांच पुल बह गए थे और 36 गांव जलमग्न हो गए थे। तब से नदी किनारे बसे गांव हर बरसात में बाढ़ और जलभराव का सामना कर रहे हैं। राजस्व देने वाले गांव, लेकिन बदहाल गिरवासा, पर्याचय, इंदुर्खी, बड़ी मड़वारी, छोटी मड़वारी, मढ़ैयन, खैरा-श्यामपुरा और भारौली समेत कई गांव हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं। पानी उतरने के बाद लोगों के सामने घर और अनाज तक का संकट खड़ा हो जाता है। विडंबना यह है कि इन्हीं गांवों की रेत से सरकार हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व कमाती है, लेकिन पुनर्वास, स्थायी बाढ़ सुरक्षा और विकास की ठोस योजना अब तक जमीन पर नहीं उतर सकी। पूर्व कमिश्नर बोले- बाढ़ प्रभावित गांवों के लिए बने विशेष राहत पैकेज सीनियर आईएएस और पूर्व संभागायुक्त राजीव शर्मा का कहना है कि सिंध नदी किनारे बसे गांवों का विस्तृत सर्वे कराया जाना चाहिए। प्रभावित परिवारों के लिए विशेष राहत और पुनर्वास पैकेज जरूरी है। उनका कहना है कि सरकार का ध्यान रेत से मिलने वाले राजस्व पर तो रहता है, लेकिन यहां रहने वाले लोगों की समस्याओं पर उतना फोकस नहीं है। बाढ़ प्रभावित परिवारों के स्थायी समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0